Bhagavad Gita: अध्याय 6, श्लोक 14

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थित: |
मन: संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्पर: || 14||

प्रशान्त-शान्त; आत्मा-मन; विगत-भी:-भय रहित; ब्रह्मचारि-व्रते-ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा; स्थित:-स्थित; मन:-मन को; संयम्य-नियंत्रित करना; मत्-चित्तः-मन को मुझ में केन्द्रित करना; युक्तः-तल्लीन; आसीत-बैठना; मत्-परः-मुझे परम लक्ष्य मानना।

अनुवाद

BG 6.14: इस प्रकार शांत, भयरहित और अविचलित मन से ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा में निष्ठ होकर उस प्रबुद्ध योगी को मन से मेरा चिन्तन करना और केवल मुझे ही अपना परम लक्ष्य बनाना चाहिए।

भाष्य

 

श्रीकृष्ण साधना में सफलता के लिए ब्रह्मचर्य का पालन करने पर बल देते हैं। प्रजनन हेतु में पशुओं में भी काम वासना की प्रवृति पायी जाती है और पशु केवल इसी उद्देश्य से इसमें लिप्त रहते हैं। अधिकतर पशु जातियों में निश्चित ऋतु में मैथुन क्रिया होती है। पशु इच्छानुसार मैथुन क्रिया में युक्त नहीं रहते जबकि पशुओं से अधिक बुद्धिमान मनुष्य के अपनी इच्छानुसार इसमें लिप्त रहने की स्वतंत्रता होने के कारण प्रजजन की विधि अनैतिक आनन्द पाने के साधन में परिवर्तित हो जाती है। वैदिक ग्रंथों में ब्रह्मचर्य का पालन करने पर बल दिया गया है। महर्षि पतंजलि ने कहा है-"ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः” (योगसूत्र-2.38) अर्थात् "ब्रह्मचर्य का पालन अति शक्तिवर्धक होता है।" 

आयुर्वेद में भी असाधारण स्वास्थ्य लाभों के कारण ब्रह्मचर्य की प्रशंसा की गयी है। धन्वन्तरि के एक शिष्य ने उनसे एक प्रश्न पूछा-“हे महर्षि! कृपया मुझे स्वस्थ रहने का रहस्य बताएँ?" उन्होंने ने उत्तर दिया-"वीर्य ही वास्तव में आत्मस्वरूप है। स्वास्थ्य का रहस्य इसी शक्ति के संरक्षण में निहित है। वह जो इस महत्वपूर्ण और अनमोल शक्ति को व्यर्थ करता है उसका शारीरिक, मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक विकास नहीं हो सकता।" आयुर्वेद के अनुसार रक्त की चालीस बूंदों से वीर्य की एक बूंद बनती है। वे जो अपने वीर्य को नष्ट करते हैं वे अस्थिर रहते हैं और प्राणों को उत्तेजित करते हैं। इससे उनकी शारीरिक और मानसिक ऊर्जा को क्षति पहुँचती है तथा स्मरणशक्ति, मन और बुद्धि दुर्बल हो जाती है। ब्रह्मचर्य के पालन से शारीरिक ऊर्जा, बुद्धि की तीक्ष्णता, दृढ़ इच्छा शक्ति, स्मरण शक्ति और आध्यात्मिक बोध की उत्कंठा में वृद्धि होती है। इससे आँखों में चमक और कपोलों पर लालिमा आती है। ब्रह्मचर्य की परिभाषा केवल शारीरिक काम वासना मात्र से दूर रहने तक सीमित नहीं है। अग्नि पुराण में मैथुन से संबंधित आठ प्रकार की गतिविधियों को नियंत्रित करने का वर्णन किया गया है

1. इसके बारे में सोचना, 2. इसके बारे में चर्चा करना, 3. इस विषय पर उपहास करना, 4. इसको देखना, 5. इसकी रुचि उत्पन्न करना, 6. किसी को ऐसा करने के लिए आकर्षित करना, 7. किसी को इसमें रुचि लेने के लिए उत्तेजित करना, 8. इसमें लिप्त रहना। इस प्रकार ब्रह्मचर्य के लिए केवल शारीरिक संभोग से दूर रहना ही आवश्यक नहीं है अपितु हस्तमैथुन, समलैंगिक गतिविधियों आदि यौनाचार से भी दूर रहना चाहिए।

आगे श्रीकृष्ण यह वर्णन करेंगे कि साधना का लक्ष्य केवल भगवान का ध्यान करना है। इस बिन्दु पर पुनः अगले श्लोक में प्रकाश डाला जाएगा।

 

स्वामीजी द्वारा इस श्लोक की व्याख्या देखें

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